12वीं में कॉमर्स की पढ़ाई करने के बाद कौन-कौन से लोकप्रिय परंपरागत कोर्स

कॉमर्स के परंपरागत कोर्स आज भी सम्मानजनक भविष्य की गारंटी माने जाते हैं। 12वीं में कॉमर्स की पढ़ाई करने के बाद कौन-कौन से लोकप्रिय परंपरागत कोर्स हैं, जहां कॉमर्स के छात्र उच्च शिक्षा हासिल करके अपना करियर बना सकते हैं, जानें इस लेख में
बारहवीं तक कॉमर्स की पढ़ाई करने वाले ज्यादातर छात्र आज भी स्किल्स आधारित कोर्स करके बाजार में बीकॉम और एमकॉम की डिग्री की मदद से करियर बना रहे हैं। 12वीं में कॉमर्स स्ट्रीम के छात्र आगे चल कर लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म, दोनों को ध्यान में रख कर अपना करियर आसानी से बना सकते हैं।

बीकॉम ऑनर्स
बीकॉम ऑनर्स एक स्पेशलाइज्ड कोर्स है, जिसे करने के बाद आमतौर पर छात्र किसी बैंक, फाइनेंशियल इंस्टीट्यूट, सरकारी, गैर-सरकारी संस्थान और उद्योग आदि में नौकरी कर सकते हैं। एक्सपर्ट कहते हैं कि बारहवीं में कॉमर्स पढ़ने वाला छात्र बीएससी फिजिक्स, रसायनशास्त्र या बॉटनी भले ही नहीं कर सकता, लेकिन इससे इतर वह कॉमर्स से संबंधित सभी कोर्स में दाखिला ले सकता है। आज कॉमर्स के छात्र, जिन्होंने 12वीं में गणित पढ़ी है, वह गणित, स्टेटिस्टिक्स या ऑपरेशनल रिसर्च कर सकते हैं। वह बीएससी कंप्यूटर साइंस भी कर सकते हैं।

बीकॉम प्रोग्राम
इसमें फाइनेंशियल अकाउंटिंग, इकोनॉमिक्स, बिजनेस संगठन, मैनेजमेंट, कंपनी लॉ, मार्केटिंग, मानव संसाधन, सांख्यिकी, ई-कॉमर्स, मार्केटिंग और अंग्रेजी में कम्युनिकेशन स्किल आदि का अध्ययन कराया जाता है। इसमें अच्छे अंक लाने पर ही आगे एमकॉम में दाखिले का रास्ता निकल कर सामने आता है। बीकॉम प्रोग्राम में दाखिला बीकॉम ऑनर्स की तुलना में कम अंकों पर मिल जाता है। इसमें छात्रों को एंटरप्रिन्योरशिप की ट्रेनिंग देने पर भी जोर दिया जाता है।

सीएस
सीएस यानी कंपनी सेक्रेटरीशिप का कोर्स आमतौर पर बारहवीं के बाद कराया जाता है। इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ इंडिया देश में विभिन्न जगहों पर स्थित सेंटरों के जरिए तीन स्तरीय कोर्स कराता है। कंपनी सेक्रेटरी बनने के दो रास्ते हैं। पहला बारहवीं के बाद और दूसरा स्नातक के बाद। बारहवीं पास छात्र को तीन स्तरीय कोर्स करना होता है। पहली स्टेज पर फाउंडेशन, दूसरे पर एग्जिक्यूटिव और तीसरे स्तर पर प्रोफेशनल प्रोग्राम होता है। कंपनी की प्रशासनिक जिम्मेदारियों को संभालने का काम करता है सीएस। कॉरपोरेट लॉ, सुरक्षा कानून, कैपिटल मार्केट और कॉरपोरेट गवर्नेंस आदि का वह जानकार होता है।

सीए चार्टर्ड अकाउंटेंसी
चार्टर्ड अकाउंटेंसी का कोर्स इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया कराता है। यह कोर्स सभी डिसिप्लिन के छात्रों को रोजगार की अलग राह दिखाता है। व्यवहार में आमतौर पर बारहवीं में कॉमर्स पढ़ने वाले या बीकॉम के छात्रों का यह सबसे पसंदीदा कोर्स है, क्योंकि इसके सिलेबस में कॉमर्स का भाग ज्यादा है। बीकॉम का बहुत-सा पाठ्यक्रम सीए में भी पढ़ाया जाता है। पारंपरिक करियर के तौर पर सीपीटी परीक्षा पास करके सीए यानी चार्टर्ड अकाउंटेंसी का कोर्स जॉइन किया जाता है और तीन स्तरों पर इसे पूरा करना होता है। इसे करने के बाद किसी भी कंपनी, बैंक, फाइनेंशियल इंस्टीट्यूट के साथ रिसर्च संस्थान, इक्विटी शेयर, ट्रेजरी या किसी कंपनी में ऑडिट विभाग में जा सकते हैं। सीए बन कर खुद की प्रैक्टिस भी कर सकते हैं।

कॉस्ट अकाउंटेंसी
सीए से मिलता-जुलता कोर्स और काम है कॉस्ट अकाउंटेंट का। वस्तुओं की वास्तविक लागत क्या है, उसे किस कीमत पर और कितने मुनाफे के साथ बाजार में उतारना है, इसका हिसाब-किताब और आकलन करने का काम कॉस्ट अकाउंटेंट करता है। इसके लिए भी कोर्स और ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है। दि इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट एंड वर्क्स अकाउंटेंट ऑफ इंडिया इसके लिए विभिन्न चरणों में कोर्स पूरा कराता है। इसे पूरा करने वाले छात्र को कॉस्ट अकाउंटेंट और इससे जुडे़ पदों पर काम करने का मौका मिलता है। कॉस्ट अकाउंटेंट बनने के लिए 12वीं पास छात्र को पहले फाउंडेशन कोर्स करना होता है। इसके लिए दि इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट एंड वर्क्स अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया में आवेदन करना होता है। एडमिशन के लिए जून और दिसम्बर में प्रवेश परीक्षा होती है। फाउंडेशन कोर्स के बाद इंटरमीडिएट कोर्स करना होता है और फिर सीए की तरह ही फाइनल परीक्षा देकर कोर्स पूरा होता है।

फाइनेंशियल स्टडीज
कॉमर्स के छात्रों के लिए फाइनेंशियल स्टडीज का कोर्स भी कई दशकों से विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में कराया जा रहा है। यह बीकॉम ऑनर्स से थोड़ा हट कर है। यह फाइनेंस के क्षेत्र में स्पेशलाइजेशन की ओर ले जाता है। सरकारी के अलावा आज यह कोर्स निजी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भी चलाया जा रहा है। इसे करने के बाद छात्र फाइनेंशियल स्टडीज में एमए कर सकते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय ऐसे छात्रों के लिए फाइनेंस में एमए कराता है।

अर्थशास्त्र
अर्थशास्त्र ऑनर्स की पढ़ाई वैसे तो आर्ट्स और सोशल साइंस से जुड़ी मानी जाती है, लेकिन व्यावसायिक गतिविधियों से संबंधित होने के कारण बीकॉम के छात्र इसमें ज्यादा रुचि लेते हैं। बारहवीं में कॉमर्स की पढ़ाई करने वाले बहुत से छात्र आगे चल कर अर्थशास्त्र में स्पेशलाइजेशन की ओर बढ़ते हैं। वे अर्थशास्त्र से बीए और एमए करते हैं। आगे चल कर विभिन्न व्यावसायिक, फाइनेंस और बैंकिंग संस्थाओं में अर्थशास्त्री के रूप में काम करते हैं। यह क्षेत्र परंपरागत तौर पर कॉमर्स के छात्रों के लिए खासा आकर्षण का केन्द्र बना रहा है।

गणित ऑनर्स
कॉमर्स के ऐसे छात्र, जिन्होंने गणित में बहुत अच्छे अंक हासिल किए हैं, उनके लिए गणित और इससे संबंधित सांख्यिकी और ऑपरेशनल रिसर्च जैसे कोर्स भी कॉलेजों में उपलब्ध हैं। दाखिले के दौरान अनिवार्य रूप से गणित की मांग की जाती है। बीएससी गणित या बीएससी सांख्यिकी के कोर्स कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लंबे अरसे से चल रहे हैं। उन्हें कट ऑफ या प्रवेश परीक्षा के आधार पर दाखिला दिया जाता है।

कंप्यूटर साइंस
कॉमर्स के छात्र, जिन्होंने बारहवीं में कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की है, वे स्नातक में कंप्यूटर साइंस से अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं। बीएससी कंप्यूटर साइंस या बैचलर इन कंप्यूटर एप्लिकेशन में ऐसे छात्रों को बखूबी दाखिला दिया जाता है। कंप्यूटर में डिप्लोमा कोर्स के जरिए भी आप अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं।

ट्रेडिशनल कोर्स क्यों?
ज्यादा सीटें और एडमिशन में आसानी: प्रोफेशनल कोर्सेज की तुलना में ये कोर्सेज यूनिवर्सिटी में कहीं अधिक उपलब्ध हैं, इस कारण एडमिशन पाना अपेक्षाकृत काफी आसान है। 10+2 में अच्छे मार्क्स होने पर मनचाहे ट्रेडिशनल कोर्स में एडमिशन पाना मुश्किल नहीं है। आमतौर पर इनके लिए किसी चयन परीक्षा का भी आयोजन नहीं किया जाता।

कम सिलेबस का बोझ: यह माना जाता है कि ट्रेडिशनल कोर्सेज का सिलेबस प्रोफेशनल कोर्सेज की तुलना में कहीं हलका होता है। कई विषय होने के कारण विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त होता है, जिनमें से अधिकांश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर वास्तविक जिंदगी से जुड़े होते हैं।
कम फीस: यह एक सच्चाई है कि सरकारी ही क्या, प्राइवेट यूनिवर्सिटी द्वारा संचालित ट्रेडिशनल कोर्सेज में आज भी प्रोफेशनल कोर्सेज की तुलना में अत्यंत कम फीस ली जाती है।

कम समय में डिग्री: आमतौर पर समस्त ट्रेडिशनल कोर्सेज की अवधि तीन वर्ष होती है, जबकि प्रोफेशनल कोर्सेज चार से पांच वर्ष तक के भी हो सकते हैं।

हिंदी माध्यम का विकल्प: अधिकांश ट्रेडिशनल कोर्सेज में हिंदी माध्यम का भी विकल्प होता है, जबकि लगभग सभी प्रकार के वोकेशनल/ प्रोफेशनल कोर्सेज में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही होता है। हिंदी माध्यम से स्कूली शिक्षा पूरी करने वाले अथवा अंग्रेजी में कमजोर युवाओं के लिए ऐसे कोर्सेज में काफी मुश्किल होती है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में उपयोगिता: विविध विषयों के चयन की छूट के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं के अनुसार विषयों की पढ़ाई/तैयारी करना संभव हो पाता है। इनमें रेलवे, बैंकिंग, स्टाफ सिलेक्शन कमीशन और यूपीएससी द्वारा आयोजित की जाने वाली चयन परीक्षाओं का उल्लेख किया जा सकता है। यानी एक पंथ-दो काज।

ओपन यूनिवर्सिटी और पत्राचार माध्यम से उपलब्ध: ट्रेडिशनल कोर्सेज ओपन और पत्राचार माध्यम से भी आसानी से किए जा सकते हैं। देश में तमाम यूनिवर्सिटीज में ये कोर्स संचालित किए जाते हैं।

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