शिक्षामित्रों को मिली कई तरह की ड्यूटी

शिक्षामित्र राशन की दुकानों से राशन बंटवा रहे हैं। गांव के स्कूलों में क्वारंटीन कर रहे गांव वालों की देखभाल कर रहे हैं। सामुदायिक किचन में ड्यूटी निभा रहे हैं। शिक्षामित्रों का कहना है कि भले ही उन्हें स्कूलों में शिक्षक बनने योग्य न पाया गया हो लेकिन सरकार प्राइमरी स्कूलों के शिक्षकों से ज्यादा उनकी ड्यूटी लगाती है।

प्रयागराज, रामपुर, सहारनपुर, गोरखपुर, प्रतापगढ़ समेत कई जिलों में शिक्षामित्रों को स्कूलों में बन रहे आश्रय स्थल या राशन की दुकानों में नोडल अफसर के रूप में लगाया जा रहा है। आश्रय स्थलों में साफ निर्देश है कि स्कूल की चाबी या तो ग्राम प्रधान के पास रहेगी या शिक्षामित्र के पास। आश्रय स्थलों में ऐसे लोगों की देखभाल का जिम्मा शिक्षा मित्रों को ही सौंपा गया है। वहीं राशन की दुकानों पर राशन बंटवाने के निर्देश भी दिए गए हैं कि वे सोशल डिस्टेंस का पालन करवाते हुए इस पर नजर रखे।

आदर्श शिक्षामित्र वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र शाही का कहना है कि शिक्षा मित्र इस तरह की परिस्थितियों में सरकार के साथ है। शिक्षा मित्रों की नियुक्ति उनके गांव में ही हुई थी लिहाजा उनसे बेहतर गांव को कोई नहीं जानता। वहीं स्कूल में पढ़ाने के कारण उनकी जागरूकता का स्तर भी अच्छा होता है। शाही का कहना है कि यदि सरकार उन्हें इस काम के योग्य मानती है तो इस महामारी से निपटने के बाद उनकी मांगों पर भी विचार करे। शिक्षामित्र लम्बे समय से मांग करते आए हैं कि उन पर भी समान कार्य-समान वेतन का सिद्धांत लागू किया जाए।

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