छोटा हो या मोटा, यही पहनो बेटा

स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कई उपाय किये गए लेकिन वर्षो से चली आ रही एक बड़ी दूर करने के लिए कोई पहल अभी तक नहीं हुई। यह है कक्षा एक से लेकर आठ तक के बच्चों के लिए एक ही दर पर ड्रेस दिलाने की व्यवस्था।

परिषदीय विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की ड्रेस में आयु के अनुसार न कपड़ा कम-ज्यादा होता है और न ही महंगाई का कोई असर पड़ता है। कक्षा एक में पढ़ने वाले छह साल के बच्चे की ड्रेस दो सौ रुपये में बनती है तो कक्षा आठ में पढ़ने वाले 14 साल के बच्चे की डेस भी उतनी ही कीमत में तैयार होती है। हकीकत में भले ही ऐसा संभव न हो पर सरकारी फरमान के अनुसार ‘जुगाड़ सिस्टम’ से कक्षा एक से आठ तक के बच्चों की एक ही कीमत में ड्रेस बनवाई जा रही है।

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कमीशनबाजी के कारण कहीं ठेके पर एक ही नाप में ड्रेस सिलाई कराई जा रही है तो अनुमान के आधार पर। हालत यह है कि बच्चा छोटा हो या फिर मोटा एक ही साइज की ड्रेस सिलवाई जा रही है। परिषदीय विद्यालयों में बच्चों को निशुल्क स्कूली ड्रेस वितरण में 100 रुपये प्रति बच्चे के हिसाब से ड्रेस की शुरुआत हुई थी। शैक्षिक सत्र 2011-12 में कीमत बढ़ने के साथ ही दो-दो सेट ड्रेस देने की व्यवस्था हुई तो प्रति बच्चा 400 रुपये के हिसाब से धनराशि भेजी जाने लगी। हर साल महंगाई बढ़ी, कपड़ा महंगा हुआ, सिलाई महंगी हुई लेकिन सरकारी रकम पांच साल से वहीं स्थिर है। इस साल भी यही हो रहा है।

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शासन ने 15 जुलाई तक ड्रेस वितरण पूरा हो जाने का समय दिया था लेकिन 28 जून को धनराशि जारी हुई जोकि अभी एक सप्ताह पूर्व ही खातों में भेजी गई है। बाजार में न कपड़ा है और न ही इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की ड्रेस सिलाई के लिए टेलर। बस ठेके पर बच्चों की ड्रेस बन रही है। कहीं एक क्लास के बच्चों की ड्रेस एक नाप की तो कहीं पूरे स्कूल की। दिक्कत तब आयेगी जब यह ड्रेस पहनने को मिलेगी।

ड्रेसखाने में अंतर पर कपड़ा समान बच्चों की आयु के अनुसार खाना और कपड़ा की आवश्यकता होती है। उत्तर प्रदेशीय जूनियर हाई स्कूल शिक्षक संघ के प्रांतीय अध्यक्ष योगेश त्यागी कहते हैं कि मिड-डे मील में तो प्राथमिक और उच्च प्राथमिक में अलग अलग धनराशि दी जाती है। प्राथमिक में चार रुपये 13 पैसे और उच्च प्राथमिक में छह रुपये 83 पैसे हैं, लेकिन ड्रेस में ऐसा नहीं है।

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सिर्फ रंग और शासनादेश की तिथि बदलती है:सरकारों के साथ बच्चों की ड्रेस का रंग बदलता रहा लेकिन व्यवस्था पुरानी ही चल रही है। अध्यापकों का कहना है कि शासनादेश में भी एक ही व्यवस्था चली आ रही है। बस जारी करने वाले अधिकारियों के हस्ताक्षर और तिथि बदलती है। बाकी सब कुछ एक सा ही चल रहा है।

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