कोर्ट की फटकार के बाद भी शिक्षक भर्ती के लिए गंभीर नहीं सरकार

नई दिल्ली : दिल्ली सरकार के स्कूलों में शिक्षकों का भारी टोटा है। अधिकांश स्कूल अतिथि शिक्षकों के सहारे चल रहे हैं। वहीं नियमित शिक्षक न होने के कारण पूरी शिक्षा व्यवस्था प्रभावित है। इसे बेहतर करने के लिए स्थायी शिक्षकों की भर्ती की जानी है, जिसके लिए हाई कोर्ट दिल्ली सरकार को कई बार फटकार भी लगा चुका है, लेकिन भर्ती प्रक्रिया को लेकर दिल्ली सरकार गंभीर नहीं दिख रही है। आलम यह है कि अतिथि शिक्षकों द्वारा मोर्चा संभालने के बाद भी तकरीबन 10 हजार शिक्षकों के पद स्कूलों में रिक्त पड़े हुए हैं।

दिल्ली सरकार के स्कूलों में शिक्षकों के 66,736 पद सृजित हैं, जिनमें से तकरीबन 40 हजार पदों पर नियमित शिक्षक हैं तो 16 हजार से अधिक पदों पर अतिथि शिक्षकों ने मोर्चा संभाला हुआ है। शिक्षकों के खाली पड़े पदों को लेकर दिल्ली सरकार ने अप्रैल में हाई कोर्ट में हलफनामा दायर किया था। जिसमें सरकार ने कहा था कि शिक्षा निदेशालय के अधीन आने वाले स्कूलों में 27 हजार से अधिक पद रिक्त पड़े हुए हैं। साथ ही सरकार ने दायर हलफनामे में स्पष्ट किया था कि वह इसी वर्ष सितंबर -अक्टूबर में इन पदों पर नियुक्ति के लिए भर्ती प्रक्रिया भी जारी करेगी, लेकिन सरकार ने 27 हजार खाली पद होने के बावजूद मात्र नौ हजार पदों पर ही नियुक्ति के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी।

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इसको लेकर अतिथि शिक्षक संगठन अपनी नाराजगी भी जता चुके हैं और सभी अतिथि शिक्षकों को समायोजित करने को लेकर आंदोलन भी कर चुके हैं। जिसके बाद अतिथि शिक्षकों के समायोजन के लिए नियम बनाये जाने को लेकर उपराज्यपाल ने भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाई। वहीं, स्कूलों में खाली पड़े स्थायी शिक्षकों के पदों को लेकर निदेशालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि उच्च माध्यमिक कक्षाओं में अधिकतम कला संकाय के विषय पढ़ाये जाते हैं। इनमें से हंिदूी (पीजीटी), अंग्रेजी (पीजीटी), इतिहास (पीजीटी), राजनीतिक विज्ञान (पीजीटी) और फिजिकल एजुकेशन (पीजीटी) शिक्षकों के कुल 2673 पद सृजित हैं, लेकिन इन विषयों के सिर्फ 60 नियमित शिक्षक ही स्कूलों में सेवारत हैं। बाकी सभी पदों पर अतिथि शिक्षक पढ़ा रहे हैं।

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तीन-चौथाई सरकारी स्कूलों में नहीं हैं प्रधानाचार्य: केजरीवाल सरकार के बेहतरीन शिक्षा उपलब्ध कराने संबंधी दावे का स्याह सच यह है कि दिल्ली सरकार के तीन चौथाई स्कूल बगैर प्रधानाचार्य के संचालित हो रहे हैं। इस कारण दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था बेपटरी हो चली है। राजधानी में दिल्ली सरकार कुल 1029 स्कूल संचालित करती है। इनमें तकरीबन 18 लाख से अधिक विद्यार्थी पढ़ते हैं। इन विद्यार्थियों का भविष्य अप्रत्यक्ष तौर से जिन प्रधानाचार्यो को संवारना है, वे स्कूलों में नियुक्त ही नहीं हैं।

असल में दिल्ली सरकार अपने स्कूलों में प्रधानाचार्यो की नियुक्ति करने में असफल साबित हो रही है। आलम यह है कि 1029 स्कूलों में से सिर्फ 250 स्कूलों को ही प्रधानाचार्य संचालित करते हैं, बाकी स्कूल उप प्रधानाचार्य के जिम्मे हैं। जिन्हें सरकार ने स्कूल प्रमुख की उपाधि दी है।

शिक्षा निदेशालय से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि स्कूलों में प्रधानाचार्य के लिए 922 पद स्वीकृत हैं, इनमें से 670 पद खाली हैं। वहीं स्कूल प्रबंधन समिति में शिक्षा सदस्य का कहना है कि स्कूलों में प्रधानाचार्यो की भारी कमी है। इसके बाद भी सरकार ने 73 प्रधानाचार्यो को स्कूल में नियुक्ति न देते हुए शिक्षा निदेशालय में नियुक्ति दी गई है। इस कारण पूरी शिक्षा व्यवस्था प्रभावित है साथ ही छात्रों के भविष्य से भी खिलवाड़ हो रहा है।

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उन्होंने बताया कि कुल स्कूलों में से जिन स्कूलों में उप प्रधानाचार्यो को स्कूल प्रमुख की जिम्मेदारी दी गई है, उनके पास प्रधानाचार्य की तरह संपूर्ण अधिकार नहीं है। इस वजह से वह शिक्षा के लिए व्यापक योजना नहीं बना पाते हैं और विद्यार्थियों की पढ़ाई पर इसका असर पड़ता है।

वहीं, स्कूल प्रबंधन समिति के सदस्य डीके तनेजा का कहना है कि सरकार को प्रधानाचार्य के खाली पड़े पदों पर शीघ्र ही नई नियुक्ति करनी चाहिए। इसके लिए स्कूल प्रमुख को पदोन्नत करना बेहतर विकल्प है या फिर स्कूल प्रमुख को ही प्रधानाचार्य के बराबर शक्तियां दी जाए।