प्राइमरी स्कूलों में छात्रों की सही संख्या का पता लगाए सरकार : अदालत

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ पीठ ने राज्य सरकार को प्राइमरी स्कूलों में छात्रों की सही संख्या पता करने के लिए नियमित तौर पर प्रत्येक जिले में निरीक्षण व जांच करने के आदेश दिये हैं। स्कूलों के रिकॉर्ड में दर्ज छात्रों की संख्या से बहुत कम छात्रों की वास्तविक उपस्थिति सामने आने पर केार्ट ने यह आदेश जारी किया है। केार्ट ने कहा कि छात्रों के संख्या की सही जानकारी लेते हुए इस मामले में नीतिगत निर्णय लिया जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय की पीठ ने अनुराग तिवारी व एक अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवायी के दौरान पारित किया। याचिका 2 अध्यापकों की नियुक्ति के सम्बंध में थी। केार्ट ने सुनवाई के दौरान सम्बंधित स्कूल का निरीक्षण करने का आदेश दिया था।

निरीक्षण के दौरान स्कूल में बच्चों की उपस्थिति मात्र 65 मिली जबकि दाखिले के रिकॉर्ड में यह 295 थी। छात्रों की संख्या के सम्बंध में आई उक्त रिपोर्ट को संज्ञान लेते हुए केार्ट ने कहा कि शैक्षिक संस्थाएं अपने रिकॉर्ड में बड़ी मात्रा में छात्रों का दाखिला दिखाती हैं लेकिन निरीक्षण में छात्रों की वास्तविक उपस्थिति बहुत कम होती है। अक्सर कहा जाता है कि यह अप्रत्यक्ष उद्देश्यों के लिए किया जाता है। लिहाजा इस पहलू पर ध्यान देना राज्य सरकार के लिए आवश्यक है। केार्ट ने कहा कि इस प्रथा पर नियमित निरीक्षण व जांच कर के रोक लगाई जानी चाहिए। इस से रिकॉर्ड में दिखाए जाने वाले छात्रों के काल्पनिक आंकड़े कम होंगे और सरकार को भी प्राइमरी स्कूलों में पढ रहे बच्चों की सही संख्या का पता चल पाएगा साथ में ये धोखाधड़ी भी बंद होगी। केार्ट ने उक्त टिप्पणियां करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि निरीक्षण की प्रक्त्रिया राज्य स्तर पर प्रत्येक जिले में की जाए।

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केार्ट ने आदेश के अनुपालन के लिए निर्णय की प्रति प्रमुख सचिव बेसिक शिक्षा को भेजने का निर्देश देते हुए कहा कि इस सम्बंध में तात्कालिक कार्रवाई करते हुए छह माह में र्नीतिगत निर्णय लें। वहीं केार्ट ने राज्य सरकार के 31 मार्च 2015 के शासनादेश व पूर्व के कुछ शासनादेशों को नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम. 2009 के प्रावधानों व इसकी अनुसूची के विपरीत पाते हुए कहा कि इन्हें बनाए नहीं रखा जा सकता। उक्त शासनादेश के द्वारा व्यवस्था दी गई थी कि एक प्राइमरी स्कूल में एक हेड मास्टर व चार अध्यापक ही होंगे। जबकि प्रावधानों के मुताबिक 35 छात्रों पर एक अध्यापक होने चाहिए। हालांकि केार्ट ने इस पर निर्णायक राय न देते हुएए राज्य सरकार को इस मामले में पुन: अवलोकन करने का आदेश दिया। न्यायालय ने कहा कि इस सम्बंध में नए नीतिगत निर्णय लिए जाएं जो सम्बंधित प्रावधानों के अनुरूप हों।

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