कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने शिक्षामित्रों और अनुदेशकों की दुखती रग पर हाथ रखा

यूपी 2017 के विधानसभा चुनाव का आकलन करे तो ऐसा माना जाता है कि जो बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला था उसके पीछे शिक्षामित्रों का बहुत बड़ा योगदान था। यूपी 2017 के विधानसभा चुनाव में शिक्षामित्रों ने बहुत से लोकलुभावन वादे किये गए थे लेकिन उन वादों पर कोई अमल नहीं किया गया है। समायोजन रद्द होने के ढाई साल बाद भी शिक्षामित्रों के लिए कोई राहत भरा कदम न उठाने से आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी को उनके कोप का भाजन बनना पड़ सकता है

कांग्रेस महा सचिव प्रियंका गांधी ने एक ट्वीट कर प्रदेश के शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के मानदेय के मुद्दे को उठाकर उनकी रग पर हाथ रख दिया है। कांग्रेस महा सचिव ने ट्वीट कर लिखा “उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों की मेहनत का रोज़ अपमान होता है। सैकड़ों पीड़ितों नें आत्महत्या कर डाली. जो सड़कों पर उतरे सरकार ने उनपर लाठियां चलाई, रासुका दर्ज किया। भाजपा के नेता टीशर्टों की मार्केट्टिंग में व्यस्त हैं, काश वे अपना ध्यान दर्द-मंदों की ओर भी डालते।”

प्रियंका ने एक और ट्वीट किया, “मैं लखनऊ में कुछ अनुदेशकों से मिली. उप्र के मुख्यमंत्री ने उनका मानदेय रु 8470 से रु 17,000 की घोषणा की थी। मगर आजतक अनुदेशकों को मात्र 8470 ही मिलता है। सरकार के झूठे प्रचार का शोर है, लेकिन अनुदेशकों की अवाज गुम हो गईे।”

मतदाता सूची से लेकर परिसीमन तक दुरुस्त करने का काम शिक्षामित्र बीएलओ बनकर निपटा रहे हैं। शिक्षा मित्र प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाने के साथ साथ सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में लाभार्थियों के सत्यापन का भी काम करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 90 फीसदी तैनात हैं। अगर एक ग्राम पंचायत आकलन करे तो ग्राम पंचायत आधा दर्जन शिक्षा मित्र हैं और उनके परिवारजन और शुभचिंतकों की संख्या 100 तक पहुंचती है। इसीलिए सपा-बसपा के साथ ही कांग्रेस भी उन्हें लुभाने में लगी है। लेकिन बीजेपी सरकार के सामने शिक्षामित्र अब नई समस्या बन कर खड़े हुए हैं।

पीएम मोदी ने की राहत देने की बात:  सपा सरकार द्वारा शिक्षा मित्रों के समायोजन को हाईकोर्ट ने गलत ठहराते हुए समायोजन रद्द कर दिया था। उसके बाद प्रधानमंत्री ने 19 सितंबर 2015 को बनारस में ‘शिक्षा मित्रों की जिम्मेदारी अब हमारी’ कहकर राहत दी थी। इसके बाद भी चुनाव के दौरान बीजेपी के बड़े नेता अपने चुनावी दौरे में सरकार बनने पर शिक्षामित्रों की समस्या सुलझाने का वादा कर रहे थे। बीजेपी ने लोक कल्याण संकल्प पत्र में यह वादा किया था कि उनकी समस्या को तीन महीनों में सुलझाया जाएगा। लेकिन सरकार बनने के दो साल बाद भी कोई ठोस रास्ता अभी तक नहीं निकला।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के कहने पर प्रदेश सरकार ने इस दौरान दो बड़ी शिक्षक भर्ती परीक्षा भी कराई, जिसमें शिक्षामित्रों को भारांक भी दिया गया लेकिन उस परीक्षा में सभी शिक्षामित्रों का समायोजन नहीं हुआ। दूसरी शिक्षक भर्ती परीक्षा में भारांक भी दिया गया लेकिन कट ऑफ मार्क निर्धारित होने की वजह से मामला फंस गया। भर्ती का मामला अभी हाईकोर्ट में लंबित है।

2019 लोकसभा चुनाव में हो सकता है नुकसान

2019 में लोकसभा की 80 सीटों को फतह करने के लक्ष्य को लेकर चल रही बीजेपी का संगठन सरकार से शिक्षामित्रों को राहत देने की उम्मीद लगाए हुए थे. इसके लिए उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के नेतृत्व में कमेटी भी गठित हुई लेकिन कोई भी फैसला न हो सका। पार्टी का मानना है कि गांव-गांव तक फैले ये पौने दो लाख शिक्षामित्र लोकसभा चुनाव तक संतुष्ट नहीं हुए तो उसके मंसूबों पर पानी फिर सकता है. यही नहीं ये शिक्षामित्र लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए सिरदर्द बन जाएं तो हैरत नहीं।

0 Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *