बच्चों की पढ़ाई, मांओं का ‘किताबी’ अभियान

बचपन में जब उन्हें नई किताबें नहीं मिलती थीं, तो वह अपनी सीनियर या पड़ोस की बालिका से मांग लाती थीं। गर्मी की छुट्टियों में इन पुस्तकों से खूब पढ़ाई करतीं। अब वह दौर नहीं है, पर लॉकडाउन में दुकानें बंद होने से किताबें नहीं मिल पा रही हैं। किताबों की चिंता में एक मां बचपन की स्मृतियों में खोई तो उसे किताबों के आदान-प्रदान का नायाब सुझाव आया। फिर पारुल ने इसे अभियान का रूप दे दिया।

बातचीत के बाद कई अन्य सहेलियां भी पारुल के साथ आईं। फिर उन लोगों ने मिलकर अब तक 100 से अधिक बच्चों को किताबें मुहैया कराया। इससे पैसे की बचत के साथ समय का सदुपयोग भी हो जा रहा है। वहीं, बच्चों की पढ़ाई हो रही है, अपने अभियान में माताएं भी सफल हो गईं हैं। गोमतीनगर विस्तार के ग्रीनवुड अपार्टमेंट में रहने वाली पारुल दुबे की अगुवाई में यह अभियान चल रहा है। पारुल बताती हैं, बच्चों का नया शैक्षिक सत्र शुरू हो गया है, लेकिन उनके पास किताबें नहीं हैं। दुकानें बंद हैं, नए सेलेबस की किताबें अब तक खरीदी नहीं जा सकी हैं। कंप्यूटर और मोबाइल पर डाउनलोड किताबें देखने में उनका समय बर्बाद हो रहा है।

इस समस्या को समझते हुए पारुल दुबे और उनकी सहेलियों ने बच्चों को किताबें उपलब्ध कराना शुरू किया। इस अभियान में साक्षी सिंह, किरण शुक्ला, मोनिका अस्थाना, अंजान वर्मा, नुपूर श्रीवास्तव, सुचि सिंह, विना सिंह, वंदना श्रीवास्तव, शिवानी शाही, रुचि सिंह, सुमी गौतम, मोनिका मिश्र, वर्षा जैन, वीनू चतुर्वेदी, सताक्षी जायसवाल और सविता त्रिपाठी सहित कई महिलाएं सहयोग कर रही हैं।

लॉकडाउन में महिलाओं ने शुरू किया पुरानी किताबों के आदान-प्रदान का अभियान, गोमतीनगर विस्तार की पारुल दुबे के प्रयास पर 100 बच्चों को मिलीं किताबें

फोन पर बातचीत, फिर अभियान शुरू

पारुल और अन्य महिलाएं अपने बच्चों की किताबें दूसरों को फोन कर दे रही थीं और दूसरों की किताबें मांग कर अपने बच्चों की पढ़ाई करवाना शुरू कर दिया। फिर उन्हें लगा, क्यों न इसे अभियान बनाया जाये। वाट्सएप ग्रुप पर चर्चा हुई तो सब एक-दूसरे की मदद करने में जुट गईं। फिर किताबें आदान-प्रदान करना शुरू हो गया। अभियान को आगे बढ़ाते हुए गोमतीनगर विस्तार सहित पूरे लखनऊ के अन्य स्कूलों की किताबों को एक-दूसरे बच्चों को दिलाई जा रही हैं। पारुल का कहना है कि हम लोग छोटे थे, तब भी पुरानी किताबों में नए जैसा ही उत्साह था, आज के बच्चों में वही बात देखने तो मिलती है। इन दिनों जिन बच्चों को किताबें मिल जा रही हैं, उनकी खुशी देखने लायक होती है।

शारीरिक दूरी और सैनिटाइजेशन का ख्याल

पारुल ने बताया कि इस अभियान में लॉकडाउन के नियमों का विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जरूरतमंदों को एक-दूसरे का फोन नंबर देकर किताबें लेने की व्यवस्था की जा रही है। कोशिश है कि आसपास के लोग हों, ताकि पैदल जाकर शारीरिक दूरी का पालन करते हुए किताबें दी जा सकें। साथ में किताबों को तत्काल सैनिटाइज कर घर ले आएं। टीम के लोगों से अपील की गई है कि किसी के घर किताबें लेने जाएं तो मेहमाननवाजी के चक्कर में न पड़ें। गेट से ही किताबें लेकर दूर से धन्यवाद देकर वापस आ जाएं।

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