सहायक अध्यापक की इच्छाशक्ति से बदल गई प्राइमरी स्कूल की रंगत

Etawah News : सरकारी प्राइमरी स्कूल। वह इटवां का हो या कहीं और का। यह सोचते ही कैसी बनी आपके मन मस्तिष्क में छवि। यही न कि – ‘मटरगश्ती करते बच्चे, परिसर और कक्ष गंदे, टूटा ब्लैकबोर्ड, गंदे कपड़ों में बच्चे, पढ़ाई से जुड़ा कोई सवाल करने पर सामने वाले का मुंह ताकते बच्चे।’ तो आप गलत हैं। कल तक बदहाल मेजा तहसील के इटवां गांव का परिषदीय स्कूल आज अनुशासन, संस्कार, स्वच्छता की गवाही दे रहा है। शिक्षा का स्तर यह है कि बच्चे बोलते हैं- ‘गुड मार्निग सर, माइ नेम इज करन, आइ लिव इन इटवां..।’ इस साल से इस स्कूल को इंग्लिश मीडियम का दर्जा मिल गया है।

कभी बदहाल रहे इस विद्यालय की बदलाव की कहानी भी अनोखी है। यहां 20 सितंबर 2017 को असल शिल्पकार बनकर पदस्थ हुए सहायक अध्यापक गिरी अजय कुमार। इसके पहले वे मुंबई में व्यापार करते थे। मुंबई में रहते थे तो विजन भी बड़ा था। खैर, सहायक अध्यापक पद पर चयन के बाद वे मुंबई को अलविदा बोल आए। आजमगढ़ के अहरौरा के रहने वाले अजय कुमार मुंबई की चकाचौंध छोड़ प्रयागराज जिला मुख्यालय से करीब 70 किमी दूर पहाड़ी इलाके के इटवां पहुंचे, जहां उनकी तैनाती हुई थी। स्कूल की व्यवस्था को लेकर उनके मन में सुनहरी छवि थी, लेकिन यह क्या..। स्कूल में गंदी व उखड़ी दीवारें, पंजीकृत 180 बच्चों में से 50 भी मौजूद नहीं, जो थे उनमें से ज्यादातर के गंदे कपड़े, टूटी बटन, स्कूल का खराब ब्लैक बोर्ड, गंदा परिसर.., यही मिला। इससे वह चिंतित तो हुए, लेकिन हारे नहीं। उन्होंने हालात को बदलने का निश्चय किया। उनका प्रयास देख प्रधानाध्यापक नवीन चंद्र, सहायक अध्यापक मनोज सरोज व खुशबू भी जुट गए स्कूल की छवि सुधारने में और शुरू हो गई बदलाव की बयार।

उन्होंने ग्राम पंचायत के माध्यम से मुख्य मार्ग से लेकर विद्यालय तक इंटरलाकिंग सड़क बनवाई। उसके बाद स्वयं एवं शिक्षकों के आर्थिक सहयोग से विद्यालय की मरम्मत कर पुताई का कार्य कराया गया। बच्चों के बैठने के लिए टाट पट्टी हटाकर सभी कमरों में दरी की व्यवस्था कराई। पैसों की बचत करने के लिए दीवारों पर स्लोगन आदि उन्होंने स्वयं लिखे। दो कमरों में जानकारी से संबंधित विभिन्न प्रकार के पोस्टर एवं बैनर लगवाए। बच्चे साफ सफाई के साथ पहुचें, इसके लिये उनके अभिभावकों से मिलकर जूते एवं यूनीफार्म को ठीक कराया। स्कूल में दाई जरूरत पर नन्हें बच्चों का हाथ मुंह धुल कर उन्हें तेल, पाउडर लगाकर कंघा करती है। अगर यूनीफार्म फटा या बटन टूट गई तो दाई उसे स्कूल में ही दुरुस्त करती है। दोपहर भोजन के पहले वह मंत्रोच्चार करते हैं, उसके बाद लाइन में बैठकर खाना खाते एवं हैंडपंप पर पानी पीते हैं। बच्चों के लिए प्रगति पुस्तक, आई कार्ड, शिक्षक रोजगार योजना आदि भी मुहैया कराया।

अब यहां 180 में से लगभग 150 बच्चे नियमित विद्यालय आ रहे हैं। यहां के बच्चे अंग्रेजी में हाय हैलो करने के साथ ही अंग्रेजी में ही परिचय दे रहे है।

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