सरकार ने शिक्षकों के सम्मान में खींची बड़ी लकीर

देश में गुरु-शिष्य परंपरा बहुत पुरानी है। गुरु का सम्मान सिर्फ शिष्य ही नहीं, बल्कि पूरा समाज करता है। समय के साथ इसमें भी बदलाव आया, राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर सरकारें चुनिंदा शिक्षकों को पुरस्कार के रूप में सम्मानित करने लगीं। चयन के लिए कमेटियां बनाकर शिक्षकों की स्क्रीनिंग होती, तब वे सम्मान के हकदार बन पाते थे। हर साल यह सम्मान पाने के लिए होड़ मचती रही है। योगी सरकार ने शिक्षकों के सम्मान में भी बड़ी लकीर खींची है। राज्य स्तरीय सम्मान की जगह पहली बार यूपी के सभी 75 जिलों का प्रतिनिधित्व हर जिले में आयोजन कराया गया है।

रविवार को बेसिक, माध्यमिक, उच्च व प्राविधिक शिक्षा विभाग ने जिलों में अलग तरह से शिक्षक दिवस मनाया। इन विभागों की ओर से हर जिले में 75-75 शिक्षकों व पांच-पांच प्रशिक्षकों यानी प्रदेश के 17,250 गुरुओं को सम्मानित किया गया। स्क्रीनिंग, साक्षात्कार व शिक्षक की शिक्षण सामग्री आदि देखने की जगह उनके प्रदर्शन को ही आधार बनाया गया, यानी उस विद्यालय का रिजल्ट और शिक्षक के विषय के रिजल्ट को चयन में वरीयता दी गई। इतना ही संबंधित शिक्षक की छवि की भी चिंता की गई है, ताकि सम्मान पर सवाल न उठे। ज्ञात हो कि पहले राज्य स्तर पर हर जिले से विभागवार एक शिक्षक को ही सम्मान मिलता रहा है, कुछ जिले से शिक्षकों की संख्या अधिक व कुछ की नगण्य भी हो जाती थी। जिलों में पहले स्थानीय अधिकारी या जनप्रतिनिधि की पहल पर ही शिक्षकों को सम्मानित किया जाता रहा है, पूर्व की सरकारों ने इस तरह सम्मानित करने की पहल नहीं की। चुनावी साल में सरकार ने बड़े वर्ग को बड़े मन से सम्मानित कराया है। इसमें यह भी ख्याल रखा गया कि शिक्षा देने में अभी वित्तविहीन कालेजों की संख्या व भूमिका अधिक है। इसलिए वित्तविहीन स्कूल-कालेजों के शिक्षकों का पचास फीसद चयन किया गया है। कोरोना की दूसरी लहर में हुए पंचायत चुनाव में सबसे अधिक शिक्षक ही हताहत हुए थे, इस निर्णय से सरकार शिक्षकों के बीच पैठ बनाने में सफल रही है।

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