सरकारी किताबों की भाषा देख गुरुजी भी चकराये

मिश्रयूपी की सरकारी किताबों की भाषा समझना बच्चों का खेल नहीं है। बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में चलने वाली गणित की किताबों में इतने कठिन शब्द दिए गए हैं कि बच्चे तो दूर इन्हें पढ़कर शिक्षक भी चकरा जाएं। चाइल्ड फ्रेंडली (बाल क्रेंद्रित) किताबों के जमाने में ये सरकारी किताबें एक करोड़ से अधिक छात्र-छात्रओं के लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं।

कक्षा सात की गणित की किताब में त्रिभुज का केंद्र पाठ में एक जगह संगमन शब्द लिखा है। इसी किताब में एक पाठ का नाम है व्यंजकों का गुणनफल एवं सर्वसमिकाएं है। इसमें एक जगह पाश्र्वांकित और आच्छादित शब्दों का प्रयोग किया गया है। कक्षा छह की गणित की किताब के लंब और समानान्तर रेखाएं पाठ में अभिगृहीत शब्द है। इसी किताब में प्रतिच्छेद, अपरिमित, अन्त्य, निरुपित जैसे शब्द लिखे हैं। ये शब्द ऐसे हैं कि एक बार शिक्षक ही चकरा जाएं। ऐसे में बच्चों के लिए इन्हें खुद से समझना बहुत कठिन है।

मान लीजिए की कोई बच्च खुद घर पर किताब लेकर पढ़ने बैठ भी जाए तो ऐसे शब्द देखने के बाद वह दूसरा विषय पढ़ना अधिक पसंद करेगा। ऐसे में सवाल उठता है कि गणित जैसा विषय जो पहले ही बच्चों को कठिन लगता है उसमें ऐसे शब्दों का प्रयोग बच्चों को इस विषय के प्रति कितना आकर्षित कर पाएगा। जानकारों की मानें तो ऐसे शब्द विषय को और कठिन बनाने के साथ उसके प्रति अरुचि पैदा करने का काम करते हैं।

गणित की किताबों को विशेषज्ञों से एक बार देखवा लेते हैं। जो शब्द बहुत कठिन हैं और बच्चों के समझ में आने लायक नहीं उनके आगे कोष्ठक में अंग्रेजी के शब्द भी लिखवाएंगे ताकि विषय को समझने में परेशानी न हो।-डॉ. सुत्ता सिंह निदेशक राज्य विज्ञान शिक्षा संस्थान एलनगंज गणित की किताबों में कई शब्द ऐसे हैं जो बच्चों को आसानी से समझ नहीं आते। अक्सर बच्चे इनका अर्थ पूछते हैं। यदि इन शब्दों के स्थान पर सरल शब्द लिखे जाएं तो विषय को समझाने में असानी होगी।-अनिल राजभर, गणित शिक्षक, पूर्व माध्यमिक विद्यालय धोबहा, धनुपुर

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