सियासत और अदालत के बीच फंसकर तबाह हुई शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण लाखों बीएड बेरोजगारों की जिंदगी

हिंदुस्तान में प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे बच्चों को गुणात्मक शिक्षा देने के लिए और 6 वर्ष से लेकर 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा देने के लिए बाल अधिकार कानून 2009 की संसद द्वारा स्थापना हुई । उत्तर प्रदेश समेत तमाम राज्यों में शिक्षकों की व्यापक कमी को देखते हुए बीएड बेरोजगारों को सीधे तौर पर प्राथमिक शिक्षक बनाने का निर्णय लिया गया। उत्तर प्रदेश में दिनांक 13 नवंबर 2011 को शिक्षक पात्रता परीक्षा हुई और पौने तीन लाख बीएड बेरोजगारों ने परीक्षा उत्तीर्ण की ।

बेसिक शिक्षा नियमावली में चयन हेतु शिक्षक पात्रता परीक्षा के अंकों को आधार बनाया गया । मायावती सरकार ने 72825 पदों पर शिक्षक भर्ती हेतु विज्ञापन निकाला । भर्ती सेवा नियमावली पर न होने के कारण हाई कोर्ट ने रोक लगा दी तथा विधानसभा चुनाव में सरकार बदल गयी तथा अखिलेश सरकार ने शिक्षक पात्रता परीक्षा में धांधली का आरोप लगाकर विज्ञापन निरस्त कर दिया और चयन का आधार शैक्षिक अंकों को बनाकर 72825 पदों पर नया विज्ञापन निकाला । कुछ बीएड बेरोजगारों ने पुराने निरस्त विज्ञापन को बहाल करने की उच्च न्यायालय की एकल पीठ में मांग की परंतु एकल पीठ ने इसलिए मांग खारिज कर दी क्योंकि विज्ञापन सेवा नियमावली पर नही था ।

बीएड बेरोजगार खंडपीठ गये और खंडपीठ ने नये विज्ञापन पर रोक लगा दी तथा निर्णायक आदेश में नये विज्ञापन का चयन का आधार रद्द कर दिया और पुराने विज्ञापन पर नियम लागू बताकर बहाल कर दिया । उत्तर प्रदेश सरकार सर्वोच्च अदालत गयी जहां पर दिनांक 25 मार्च 2014 को सर्वोच्च अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश पर अंतरिम रूप से भर्ती करने का आदेश किया ।

उच्च न्यायालय ने सेवा नियमावली से भर्ती करने का आदेश किया था मगर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश पर विशिष्ट बीटीसी की तरह कई वर्गों में पद को विभाजित करके चयन प्रक्रिया प्रारंभ की । जिसके परिणाम स्वरूप तीन चरण की काउंसलिंग में किसी वर्ग में मेरिट न्यूनतम आ गयी तो किसी-किसी वर्ग में आसमान को छुए रखा ।

माननीय सुप्रीम कोर्ट में नये विज्ञापन के पैरवीकार रहे राकेश द्विवेदी ने न्यायमूर्ति श्री दीपक मिश्रा से कहा कि तीन चरण की काउन्सलिंग में मेरिट में बहुत असमानता आयी है क्योंकि हाई कोर्ट ने भर्ती पर सेवा नियमावली लागू बताया है , मगर राज्य नियम का पालन नही कर रही है । आरक्षण नियमों का भी उलंघन कर रही है । किसी अधिवक्ता ने बताया कि उत्तर प्रदेश में तीन लाख पद रिक्त हैं और पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण लोग उससे कम हैं ।

दिनांक 17 दिसंबर 2014 को न्यायमूर्ति श्री दीपक मिश्रा ने दिनांक 25 मार्च 2014 का न्यायमूर्ति श्री एचएल दत्तू का अंतरिम आदेश मॉडिफाई कर दिया तथा सर्वप्रथम शिक्षक पात्रता परीक्षा में सामान्य 70 फीसदी और आरक्षित 65 फीसदी तक अंक पाने वालों को आरक्षण की शर्तों के साथ नियुक्त करने का आदेश किया । न्यायमूर्ति धीरे-धीरे मेरिट गिराकर सभी बीएड वालों को नौकरी देने को उत्सुक थे । जबकि उत्तर प्रदेश सरकार उन पदों को 1.78 लाख शिक्षामित्रों को सौंपे जा रही थी ।

सरकार कोई भी आरक्षण नियम लागू न करते हुए मात्र चयन सूची में आने वाले टीईटी में सामान्य 105 और आरक्षित 97 अंक से कम पाने वालों को बाहर कर दिया । मैंने उस वक़्त न्यायालय की मानसिकता समझ ली कि न्यायालय अंतरिम आदेश से प्रक्रिया पूर्ण कराना चाहती है । इसलिए चाहता था कि अंतरिम आदेश से भर्ती नियम संगत तरीके से हो ।

नियमावली का संशोधन 15 रद्द था और संशोधन 12 से हो रही भर्ती भी नियम से नही थी । यदि संशोधन 15 सुप्रीम कोर्ट बहाल कर देती तो यह भर्ती न हो पाती । दिनांक 25 फरवरी 2015 को शिक्षक पात्रता परीक्षा में 97 अंक अर्थात 65 फीसदी से कम अंक पाने वाले एससी के अभ्यर्थियों ने कहा कि भर्ती 72825 पदों की है  इस पर क्राइटेरिया नही लागू की जा सकती है ।

सरकार ने कहा कि उसके पास अब 65 फीसदी से अधिक अंक पाने वाले का आवेदन मौजूद नही है । जिसपर कोर्ट ने आरक्षित की क्राइटेरिया पांच फीसदी गिराकर 60 फीसदी अर्थात 90 अंक कर दी । मगर आदेश में लिखाया कि जब तक 65 फीसदी तक के सभी आरक्षित का चयन न हो जाये क्राइटेरिया गिराई नही जाएगी । किसी भी 97 अथवा 97 अंक से अधिक अंक पाने वाले ने सरकार का विरोध नही किया ।

मेरिट शैक्षिक सही है कि गलत , टीईटी के भारांक की क्या अवधारणा है , इस विषय पर बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षामित्रों के समायोजन पर रोक लगा दी । हाई कोर्ट ने मुकदमे के निस्तारण में शिक्षामित्रों का समायोजन निरस्त कर दिया । शिक्षामित्र भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गये । मुझे महसूस हुआ कि कोर्ट जनरल में सभी 105 अंक तक वालों को नियुक्त समझ रही है ,

तब मैंने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि 115 अंक पाकर 75 जिले में आवेदन भेजकर और साठ फीसदी अंक स्नातक में पाकर मैं भर्ती से बाहर क्यों हूँ ? समस्या के समाधान का आदेश हुआ , सरकार ने फिर 14690 शीट जो कि खाली थी उसपर 12091 को ही पात्र माना और दिनांक 7 दिसंबर 2015 को रिक्त ढाई हजार शीट में 1100 याचियों की नियुक्ति का आदेश हुआ । उसके बाद कई अंतरिम आदेश हुए मगर सरकार ने लागू नही किया ।

दिनांक 27 अप्रैल 2017 से दिनांक 19 मई 2017 के बीच सुनवायी करके दिनांक 25 जुलाई 2017 को जस्टिस श्री आदर्श कुमार गोयल की पीठ ने फैसला सुना दिया । टीईटी का भारांक मात्र एक सुझाव था इसलिए संशोधन 15 से नियुक्त हुए 99132 लोग की नौकरी बच गयी । बीएड वालों के नये विज्ञापन को कोर्ट ने सही माना लेकिन 66655 लोगों की नौकरी को रद्द नही किया । अब मात्र सुप्रीम कोर्ट ने जिस परिपेक्ष्य में आदेश दिया था वह लागू किया गया था कि नही , यही मुद्दा उठाया जा सकता है ।

शिक्षामित्रों का समायोजन निरस्त हो गया मगर राजनीति, अदालत में फंसकर और धोखे का शिकार होकर बीएड बेरोजगार अब भी सड़कों पर धूल फांक रहे हैं । दिनांक 31 मार्च 2014 को इनकी प्राइमरी में नियुक्ति की अवधि भी खत्म हो चुकी है और सुप्रीम कोर्ट ने सबकुछ राज्य पर छोड़ दिया है । राहुल पाण्डेय ।

 

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