शिक्षामित्रों को लेकर चुनौतियों से जूझेगी सरकार

सुप्रीम कोर्ट द्वारा शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द करने के बाद से शिक्षामित्र सड़क पर उतर आये है। प्रदेश सरकार के लिये इन शिक्षामित्रों के कोई राह निकालना इतना आसान नहीं है। क्योकि प्रदेश सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ पौने दो लाख शिक्षामित्रों का मसला है वही दूसरी तरफ लगभग एक लाख टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थी हैं, जिन्होंने इस आधार पर supreme court तक लड़ाई लड़ी कि वे नियुक्ति की पूरी पात्रता रखते हैं। यह मामला भाजपा सरकार के गले की ऐसी फांस बन गई है जोकि उनको अब उगलते बन रहा है, न निगलते। प्रदेश के Primary schools में बड़ी संख्या में teachers की कमी के चलते हुए 2000 में ग्रामीण और 2006 में नगरीय क्षेत्रों में शिक्षामित्रों नियुक्त किया गया था। उस समय सरकार ने इनकी योग्यता इंटरमीडिएट रखी गई थी। हालांकि बीएड को वरीयता देने की बात भी कही गई थी। सरकार ने प्रारंभ में शिक्षामित्रों का मानदेय 2250 रुपये तय किया गया था जिसे 2006 से बढ़ाकर 3500 कर दिया गया। इन शिक्षामित्रों का चयन ग्राम शिक्षा समितियों के द्वारा किया गया था। जिसके अध्यक्ष ग्राम प्रधान थे। दस साल बाद 2009 तक इनकी संख्या सवा लाख से ऊपर हो चुकी थी और सभी राजनैतिक पार्टी इनको वोट बैंक के रूप में देखने लगी और सभी पार्टी इन पर दाव लगाने लगी

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जबकि केंद्र सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए नियम घोषित कर रखे हैं, इसके बावजूद भी शिक्षामित्रों को स्थायी नियुक्ति का चारा फेंका गया। राजनीतिक फायदे के लिये तत्कालीन बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने इन शिक्षामित्रों की नियुक्ति शुरू कर दी और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) को शिक्षामित्रों को दूरस्थ बीटीसी प्रशिक्षण कराने का प्रस्ताव भेज दिया और तत्कालीन सरकार को 2011 में इसकी अनुमति मिल गई। इसके पीछे तत्कालीन सरकार की मंशा शिक्षामित्रों को नियुक्ति देकर राजनीतिक लाभ हासिल करने की थी हालांकि सरकार चली जाने से ऐसा न हो सका।

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बहुजन समाज पार्टी की सरकार चले जाने के बाद अखिलेश सरकार सत्ता में आयी और इसका लाभ उठाते हुए 1.73 shikshamitron को समायोजित करने का फैसला लिया। दो चरणों में 1.37 लाख शिक्षा मित्रों को नियुक्ति किया गया और शिक्षामित्रों को सरकारी खजाने से वेतन भी मिलने लगा। सपा सरकार अपने इस फैसले के प्रति इतना आग्रही थी कि उसने सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व के फैसलों की भी अनदेखी कर दी और TET passed candidates की नाराजगी का खतरा भी उठाया। इन्ही अभ्यर्थियों ने समायोजन को चुनौती दी और अंतत: सुप्रीम कोर्ट में शिक्षामित्रों के समायोजन को तर्क संगत न ठहराया जा सका। दूसरी ओर एक लाख से अधिक शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण अभ्यर्थी हैं जो लगातार सरकार पर इस बात के लिए सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं कि उनकी योग्यता के आधार पर उन्हें नियुक्ति दी जाए। इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी है। सरकार अपने हलफनामे में यह बात कह भी चुकी है कि वह उन्हें नियुक्तियां देगी। Tet Sangharsh Morcha के संजीव कुमार मिश्र कहते हैं कि सरकार को पहले हमारी ओर देखना होगा। हमारे बीच बीएड, एमएड और पीएचडी भी हैं। योग्य टीचरों की अनदेखी भला कैसे की जा सकती है।

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