खेत की मेड़ पर चरवाहों की ‘पाठशाला’

शिक्षा सबका अधिकार है और बगैर शिक्षित हुए आज के दौर में आगे बढ़ पाना मुश्किल है। यह लोकतंत्र की मजबूती के लिए भी जरूरी है। इसे समझा जसरा के बभोलवा आदिवासी बस्ती स्थित प्राथमिक विद्यालय में तैनात प्रधानाध्यापक डा. सुरेंद्र प्रताप (एसपी) ने। कामकाज के चक्कर में पढ़ाई से दूर बच्चों में पढ़ाई की लगन पैदा करने के लिए उन्होंने अनोखा प्रयोग किया। इस प्रयोग में मवेशी खेत में चरते हैं और उनकी रखवाली में लगे बच्चे मेड़ पर होमवर्क कर रहे होते हैं। प्रयोग ने असर दिखाया, अब सभी बच्चे स्कूल जाते हैं।

डा. एसपी सिंह विरहा गांव कोरांव के रहने वाले हैं। 31 दिसंबर 2005 को उनका चयन बेसिक शिक्षा विभाग में अध्यापक के पद पर हुआ। कोरांव के ही सैम्हा गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय में तैनाती मिली। 30 दिसंबर 2010 को प्रधानाध्यापक पद पर पदोन्नति के साथ जसरा के बभोलवा आदिवासी बस्ती स्थित प्राथमिक विद्यालय में स्थानांतरण हो गया। यहां तमाम बच्चे स्कूल नहीं आते थे। कारण जानने के लिए वह बस्ती में गए तो पता चला कि बड़े-बुजुर्ग काम-धंधा करने चले जाते हैं। ऐसे में भेड़, बकरी, मवेशी चराने अथवा शिशुओं को खिलाने की जिम्मेदारी नौनिहाल संभालते हैं।

उन्होंने बच्चों और परिजनों को समझाया कि जब वह मवेशी चराने जाने लगें तो 10 मिनट के लिए स्कूल आ जाया करें। कुछ बच्चे स्कूल आने लगे तो उन्हें वे होमवर्क दे दिया करते थे, जिसे वह मवेशी चराने के दौरान कर लेते थे। इसका नतीजा ये हुआ कि धीरे-धीरे आठ-10 बच्चे घर में भी पढ़ाई करने लगे। तब वह उन बच्चों के घर भी जाकर होमवर्क देने लगे। इस प्रयास पर अभिभावक भी सोचने को मजबूर हो गए। 1प्रधानाध्यापक का दावा है कि इस साल बस्ती के शत प्रतिशत बच्चों का नामांकन स्कूल में हो गया। बस्ती की दो बच्चियों अंगूरा और प्रमिला का दाखिला कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय घूरपुर में कराया।

डा. सिंह बताते हैं कि सरकार से मिलने वाली किताब बच्चों को देते हैं, लेकिन पेन, पेंसिल और कापी खुद खरीदकर देते हैं। उन्होंने 12 मार्च 2017 से खरकौनी में निश्शुल्क रविवारीय वैचारिक पाठशाला का संचालन शुरू किया। इसमें सुबह आठ से 10 बजे तक वह ऐसे बच्चों को पढ़ाते हैं, जिनके मां-बाप बच्चों को स्कूल नहीं भेज सकते हैं अथवा जो स्कूल जाने के बाद भी पढ़ाई में आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। उनके साथ सहयोगी अंजय पाण्डेय बच्चों को योग भी सिखाते हैं, ताकि बच्चे स्वस्थ और फुर्त रहें।

अभिभावक यह कहते हैं – खरकौनी के मोनू भारतीय बताते हैं कि उन्होंने अपनी बेटी सोनी का दाखिला प्राथमिक विद्यालय में कराया है। जब से वह रविवारीय वैचारिक पाठशाला में जाने लगी, पढ़ने में तेज हो गई है। दूसरी बेटी सोनाक्षी और बेटा गगन को भी वहां पढ़ने भेजते हैं। खरकौनी के ही रमेश भारतीय के अनुसार उनके दोनों बेटे व बेटी पढ़ने नहीं जाते थे, लेकिन जब से तीनों मास्टर साहब के संपर्क में आए, पढ़ने जाने लगे।

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