निजी स्कूलों को जमीन खो रहे परिषदीय विद्यालय

लखनऊ  – नि:शुल्क शिक्षा, मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और मिड-डे मील के अलावा दूध व फल जैसे प्रलोभन भी बेसिक शिक्षा परिषद की ओर से संचालित विद्यालयों में बच्चों को टिकाये रखने में कारगर नहीं साबित हो रहे हैं। बेसिक शिक्षा पर सरकार की ओर से खर्च ज्यों-ज्यों बढ़ रहा है, परिषदीय स्कूलों में बच्चों की संख्या त्यों-त्यों गिर रही है।

परिषदीय विद्यालयों की घटती साख का ही नतीजा है कि वे निजी स्कूलों को अपनी जमीन खोते जा रहे हैं। कड़वी सच्चाई है कि परिषदीय प्राथमिक स्कूलों में वर्ष 2011-12 में छात्र-छात्रओं का नामांकन 1.46 करोड़ था, वह 2016-17 में घटकर 1.16 करोड़ रह गया है। छात्र नामांकन में गिरावट उच्च प्राथमिक स्कूलों के लिए भी चुनौती बनी हुई है।

उच्च प्राथमिक स्कूलों में 2011-12 में जहां 42 लाख बच्चे नामांकित थे, वहीं 2016-17 में उनकी संख्या घटकर 35.38 लाख रह गई है। यह तब है जब इस दरम्यान प्रदेश में न सिर्फ परिषदीय विद्यालयों की संख्या बढ़ी बल्कि उनमें पढ़ाने वाले शिक्षकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है।

परिषदीय विद्यालयों में नामांकन के बाद स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की सालाना दर 10 प्रतिशत है जो बेसिक शिक्षा के पूरे तंत्र पर सवाल खड़े करती है। ंिचंताजनक तथ्य है कि बेसिक शिक्षा पर हर साल अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी परिषदीय विद्यालय प्रतिस्पर्धा में निजी स्कूलों से पिछड़ते जा रहे हैं। प्रदेश के निजी स्कूलों में ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं जबकि परिषदीय विद्यालयों की तुलना में उनकी संख्या आधी भी नहीं है।

सूबे में 1,61,329 परिषदीय विद्यालय हैं जिनमें 1,66,02,729 छात्र नामांकित हैं। उनकी तुलना में प्रदेश में महज 72,341 निजी स्कूल हैं जिनमें विद्यार्थियों की नामांकन संख्या 1,67,06,839 है। जहां परिषदीय विद्यालयों में छात्रों की संख्या गिरती जा रही है, वहीं निजी स्कूलों में उनकी तादाद में लगातार वृद्धि हो रही है। पिछले महीने यह मुद्दा प्रदेश में सर्व शिक्षा अभियान की समीक्षा के लिए आये ज्वाइंट रिव्यू मिशन ने बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ हुई बैठक में उठाया था।

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