टेंडर गुत्थी सुलझी, लेकिन जुलाई में किताबें मिलना मुश्किल

लखनऊ : शासन ने आखिरकार पूर्ववर्ती सरकार में तय शर्तों पर हुए टेंडर के आधार पर ही परिषदीय स्कूलों में पढ़ायी जाने वाली किताबों की छपाई का ठेका देने का फैसला गुरवार को कर लिया। यह बात और है कि टेंडर प्रक्रिया में हुई के चलते जुलाई में बच्चों के हाथों में किताबें पहुंचना मुश्किल है।

परिषदीय स्कूलों में कक्षा एक से आठ तक के सभी बच्चों को पढ़ाई के लिए सरकार मुफ्त में किताबें देती है। शैक्षिक सत्र 2017-18 में बच्चों को बांटी जाने वाली किताबों की छपाई के लिए बेसिक शिक्षा विभाग ने 31 दिसंबर 2016 को टेंडर नोटिस जारी कर निविदाएं आमंत्रित की थीं। विभाग ने प्रकाशकों से छह फरवरी तक निविदाएं मांगी थीं। सात मार्च को टेक्निकल बिड खुली जिसमें 13 प्रकाशकों ने क्वालिफाई किया। वहीं चार मई को फाइनेंशियल बिड खोली गईं जिसमें सबसे कम रेट कोट करने वाले प्रकाशक ने पिछले साल से ज्यादा रेट कोट किये थे।

इससे किताबों की छपाई लागत बढ़ने के आसार हैं। इस ओर ध्यान आकर्षित करते हुए बेसिक शिक्षा निदेशालय ने टेंडर प्रक्रिया को निरस्त कर नये सिरे से निविदाएं आमंत्रित करने का प्रस्ताव शासन को भेजा था। इस प्रस्ताव को लेकर शासन स्तर पर असमंजस था। नये सिरे से टेंडर निकालने के लिए प्रकाशकों को एक महीने की नोटिस देनी पड़ती जिसकी वजह से जुलाई में बच्चो को किताबें मिल पाना नामुमकिन हो जाता। लिहाजा शासन स्तर पर गुरुवार को हुई बैठक में पुरानी टेंडर प्रक्रिया के आधार पर ही किताबों की छपाई के लिए प्रकाशकों से अनुबंध करने की सहमति बनी। इस बाबत गुरवार देर शाम आदेश भी जारी कर दिया गया।

इसके बावजूद मौजूदा हालात में परिषदीय स्कूलों के बच्चों को नई किताबें मिल पाना मुश्किल है। वजह यह है कि तकरीबन 12.5 करोड़ किताबें छापी जानी हैं। बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि एक महीने में इतनी बड़ी संख्या में किताबों की छपाई कर उनकी डिलीवरी कर पाना मुमकिन नहीं है। उधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधानमंडल के गुजरे सत्र में दोनों सदनों में कह चुके हैं कि 15 जुलाई तक बच्चों को किताबों के साथ यूनिफॉर्म, जूते-मोजे भी मिल जाएंगे। शासन की मंशा के अनुरूप बच्चो को जुलाई में किताबें मिल पाने के सवाल पर अपर मुख्य सचिव राज प्रताप सिंह ने कहा कि टेंडर प्रक्रिया में विलंब के कारण इसमें कुछ मुश्किल तो आएगी लेकिन हम प्रकाशकों से अनुरोध करेंगे कि बच्चों के हित को देखते हुए वह जुलाई में किताबों की डिलीवरी कर दें।

आसान न होगा प्रकाशकों पर शिकंजा कसना1बेसिक शिक्षा विभाग के लिए प्रकाशकों पर शिकंजा कसना आसान नहीं होगा। वजह यह है कि किताबों की छपाई के लिए हुए टेंडर में पाठ्यपुस्तकों की डिलीवरी की मियाद को 15 दिन और बढ़ा दिया गया है। पहले शर्त यह होती थी कि अनुबंध की तिथि से 75 दिन तक किताबें और 90 दिन तक वर्क बुक की डिलिवरी न करने पर प्रकाशकों को किये जाने वाले भुगतान में कटौती की जा सकती है। इस बार टेंडर की शर्तों में किताबों के लिए यह समयसीमा बढ़ाकर 90 दिन और वर्क बुक के लिए 105 दिन कर दी गई है।
लेटलतीफी

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