शिक्षकों का अभाव

प्रदेश में राजकीय हो या सहायता प्राप्त अशासकीय स्कूल, इनमें शिक्षकों के वेतनमान, सुविधाएं आदि में कोई फर्क नहीं है, लेकिन इनकी भर्तियों में फर्क जरूर दिखता है। सहायता प्राप्त अशासकीय स्कूल शिक्षकों की भीषण कमी से जूझ रहे हैं। पठन-पाठन की स्थिति लगातार बदतर हो रही है, तुर्रा यह कि इन स्कूलों को निजी स्कूलों से स्पर्धा करनी है। भला ऐसे में ये स्कूल गुणवत्ता में सुधार कैसे कर पाएंगे, ये तो पब्लिक स्कूलों से स्पर्धा का ख्याली पुलाव पकाने वाले ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन इतना जरूर तय है कि शिक्षकों की भर्ती में यूं ही लेट लतीफी जारी रही तो शिक्षा का रहा सहा स्तर भी धराशायी हो जाएगा। जहां राजकीय माध्यमिक स्कूलों को नौ हजार शिक्षक मिल चुके हैं, वहीं सहायता प्राप्त अशासकीय स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। योगी सरकार राजकीय कालेजों में नौ हजार से अधिक एलटी ग्रेड शिक्षकों की भर्ती के लिए नियमावली में बदलाव करके आदेश दे चुकी है, जबकि सहायता प्राप्त अशासकीय कालेजों में लगभग इतनी ही भर्तियां अटकी हुई हैं।

दरअसल, माध्यमिक विद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती के लिए नए आयोग का गठन किया जाना है। नए आयोग के गठन के पीछे योगी सरकार का तर्क यह है कि पिछले शासनकाल में भर्ती में तमाम गड़बड़ियां सामने आई थीं। अब माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड और उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग का विलय कर दिया जाएगा। ड्राफ्ट तैयार है, गठन की पूरी तैयारी हो चुकी है, लेकिन आगे की प्रक्रिया कच्छप गति से बढ़ रही है। आयोग में एक अध्यक्ष और दोनों बोडोर्ं के छह-छह सदस्य रखे जाएंगे। नए आयोग का अधिनियम तैयार करने के लिए दो कमेटी भी बनी है। इन कमेटियों की भी संस्तुतियों पर विचार के लिए अलग टीम गठित की गई है। बहरहाल, शिक्षकों की भर्ती की जो भी प्रक्रिया अपनाई जा रही हो, यदि इसमें तत्परता दिखाई जाए तभी विद्यार्थियों का भला हो सकता है।शिक्षकों की भर्ती की जो भी प्रक्रिया अपनाई जा रही हो, यदि इसमें तत्परता दिखाई जाए तभी विद्यार्थियों का भला हो सकता है

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