अनपढ़ दंपती जला रहा शिक्षा की लौ

शिमला: जिंदगी में अपने लिए और अपनी संतान के लिए तो हर कोई कुछ भी करने के लिए तैयार रहता है, लेकिन दूसरों के लिए जो अपना सब कुछ लगा दे, ऐसे लोग विरले ही होते हैं। इन्हीं में से एक दंपती हिमाचल प्रदेश में शिमला जिले के ठियोग इलाके में रहता है। संतान का सुख न मिलने के बावजूद दूसरों के बच्चों में भी अपनापन ढूंढने वाला यह दंपती शिक्षा के मंदिर बनाने में जुटा है। अनपढ़ होने के बावजूद 80 वर्षीय मानचंद राणा और बेगी देवी स्कूल भवन बनाकर दूसरों के बच्चों का भविष्य संवारने में लगे हैं। घर के हालात ऐसे थे कि खुद पढ़ाई नहीं की, लेकिन अब चाहते हैं कि कोई भी बच्चा उनकी तरह अशिक्षित न रहे, इसके लिए वह स्कूल बनवाने में सहयोग कर रहे हैं।

ठियोग निवासी मानचंद राणा अपनी कमाई का सत्तर से अस्सी फीसद जनसेवा में लगा रहे हैं। अभी राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला ठियोग में करीब सात लाख रुपये देकर तीन कमरें बनवा दिए हैं। इससे पहले भी ऐसे भवन बनाने में मदद कर चुके हैं। मूलत: कांगड़ा जिले के ज्वालाजी क्षेत्र के कलांबरी निवासी मानचंद राणा शादी के बाद से ठियोग में ही बस गए हैं। यहां वह पत्नी के साथ रहते हैं।

अपने बचपन के दिनों की याद करते हुए मानचंद कहते हैं कि हमने गरीबी को करीब से देखा है। वह भी दौर था कि पेट की भूख मिटाने के लिए एक रुपये मासिक पर बकरियां और पशुओं को चराया करते थे। पढ़ाई तो की नहीं थी, लेकिन उस जमाने में वाहन चालक इत्यादि की नौकरी मिल जाती ती। आखिर ड्राइवर का प्रशिक्षण लेने के बाद परिवहन विभाग में 1965 में 156 रुपये मासिक पर सेवाएं शुरू कीं। ठियोग में आकर बेगी देवी से विवाह करने के बाद रहने लगे इस दौरान कई वषों तक संतान की लालसा में रहे लेकिन संतान का सुख न मिलने के बाद दूसरों के बच्चों में ही संतान सुख को खोज लिया।

बच्चों को शिक्षा का माहौल तभी मिलेगा जब शिक्षा का मंदिर उच्च कोटी का होगा। यही कारण है कि शिक्षा के मंदिर को संवारने के लिए बीड़ा उठा लिया है। मानचंद-बेगी अब केवल अपनी बीमारी और घर खर्च की राशि को ही अपने पास रख रहे हैं और बाकी जो भी आय है, पेंशन है, उसे बच्चों व समाज के विकास में लगाने की ठाने हुए हैं। अस्सी वर्ष की आयु में हृदय रोगी होने के बाद भी स्वयं स्कूलों में जाकर सहयोग दे रहे हैं।

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